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Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 245 of 268

(कवित्त) प्यार ही की कुंज और प्यार ही की सेज रची , प्यार ही सौं प्यारे लाल प्यारी बात करहीं। [1] प्यार ही की चितवनि मुसिकनि प्यार ही की, प्यार ही सौं प्यारी जू कौं प्यारौ अंक धरहीं॥ [2] प्यार सौं लटकी रहैं प्यार ही सौं मुख चहैं, प्यार ही सौं प्यारौ प्रिया अंक भुज भरहीं। [3] 'हित ध्रुव' प्यार भरी प्यारी सखी देखै खरी, प्यारै-प्यार रह्यो छाई, प्यार-रस ढरहीं॥ [4] - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, आनंद दशा विनोद (44) (कविता) प्यार का बगीचा और प्यार की क्यारी रची है, प्यार तो प्यार है, चलो प्यार की बात करें। [1]. [3] 'हित ध्रुव' प्यार भरी प्यारी सखी देखा खरी, प्यारा-प्यार रहयो छै, प्यारा-रस धरहिं.. [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, आनंद दशा विनोद (44)
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