हौं निज सखियनि की बलिहारी

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 41 of 268

(राग सारंग) श्री राधावल्लभ लाल की आरती। रतन जटित कंचन की मनिमय, हित सौं सहचरि वारती॥ [1] अंग-अंग की आभा झलकत, अद्भुत रूप निहारती। 'हित ध्रुव' सखी प्रेम की सीवा, कैसेहुँ पलक न टारती॥ [2] - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (20) (राग सारंग) आरती श्री राधावल्लभ लाल की। रतन जाति कंचन मणि, हित सौं सहचरी वर्ती।।[1] अंग-अंग की आभा दिखती है, दिखता है अद्भुत रूप। 'हिट ध्रुव' सखा, प्रेम के शिव, कैसे न झपकूँ पलक.. [2] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, पद्यावली (20)
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