वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 57 of 268
अति सुरूप सुकुवाँर तन, नव किसोर सुखरासि।
हरत प्रान सब सखिनि के, करत मन्द मृदु हासि॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (27)
अति सुन्दर मधुर शरीर, यौवन और सुख। सब सखाओं का हरा-भरा जीवन, मंद-मंद हँसी... - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीलाएँ, वृन्दावन शत लीला (27)