वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 72 of 268
ऐसे रस में दिन मगन, नहीं जानत निसि भोर।
वृन्दावन में प्रेम की, नदी बहै चहुँ ओर॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (33)
दिन इतना आनंदमय होता है कि सुबह का पता ही नहीं चलता। वृन्दावन में सर्वत्र प्रेम की नदी बहती है.. - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (33)