हौं निज सखियनि की बलिहारी
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 78 of 268
(राग सारंग)
हौं निज सखियनि की बलिहारी।
जुगल-प्रीति अरु रूप जिनहिं कै, जीवन यहै सुधा री॥ [1]
नैननिं मग ह्वै पान करत दिन, तिहिं रस में रहैं लीन।
सहि न सकत पल पलकनि अंतर, जैसैं जल में मीन॥ [2]
छिन-छिन नवल प्रिया सुख चाहत, और न मन कछु भावत।
'हित ध्रुव' जिहिं विधि रूचि प्यारी मन, तिहिं-तिहिं भाँति लड़ावत॥ [3]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (34)
(राग सारंगा) मैं अपने मित्र के लिए बलिदान हूँ। जुगला-प्रीति अरु रूप जिनहि कै, जीवन है है सुधा री.. [1] नन्निन मग हवै पण कर्ता दिन, तिहिं रस पुरुष रहे लिन। पलकों में अंतर नहीं, जैसे मन में पानी.. [2] धीरे-धीरे नवल प्रिया सुख चाहती है, और मन में कोई भाव नहीं। 'हिट ध्रुव' जिहिन विधि, रुचि प्यारी मन, लड़त तीन-तीन। [3] - श्री हित ध्रुव दास, बयालिस लीला, पद्यावली (34)