यह सुख निरखि सखी नित प्रमुदित

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 135 of 135

यह सुख निरखि सखी नित प्रमुदित, प्राण करै बलिहारी। भगवत रसिक पियत या रस को, और लगे सब खारी॥ - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 6 (6) यह सुखहीन सखी सदैव प्रसन्न रहती है और अपना जीवन न्यौछावर कर देती है। भगवत रसिक पीते हैं या रस चखते हैं, सब कुछ सत्य लगता है.. - श्री भगवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 6 (6)
चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि