दुर्लभ वृंदा-विपिन है, राख्यौ सब तें गोइ
Bhajan Shata — श्री ध्रुवदास
Verse 1 of 3
भक्त प्रकार अनेक विधि, मन-मन औरै बात।
जे भीजें विपिन-विहार-रस, तिनहिं न और सुहात॥
- श्री ध्रुवदास, भजन शत (57)
भक्त, मानसिकता आदि कई प्रकार के होते हैं। जे भीजेन विपिना-विहार-रस, तिनहिं ना और सुहत।। - श्री ध्रुवदास, भजन शत (57)