अहो मधु-पुरी धन्या
Bhakti Rasamrit Sindhu — श्री रूप गोस्वामी
Verse 3 of 8
भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते।
तावद् भक्ति-सुखस्यात्र कथम् अभ्युदयो भवेत्॥
- श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.22)
भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा यावत् पिशाचि हृदि वर्तते। तवद् भक्ति-सुखसयात्रा कथं अभ्युदयो भवेत्.. - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.22)