अहो मधु-पुरी धन्या

Bhakti Rasamrit Sindhu — श्री रूप गोस्वामी

Verse 5 of 8

मथुरां च परित्यज्य यो’न्यत्र कुरुते रतिम्। मूढो भ्रमति संसारे मोहिता मम मायया॥ - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.211) मथुरां च परित्यज्य योजनात्र कुरुते रतिम्। मुधो भ्रमति संसारे मोहिता मम माया.. - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.211)
अहो मधु-पुरी धन्याअहो मधु-पुरी धन्या