उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 1 of 131

(कवित्त) काहू कै पूजा को आस काहू कैं बिषै बिलास, काहू कैं उदिम श्रम ग्रह बन बास कौ। [1] कोऊ महातम ग्याँन कोऊ मन धरै ध्यान कोऊ साधन विधाँन दिन तन त्रास कौ॥ [2] काहू कैं नामैं निरबाहु कोऊ पोथी अवगाहु कोऊ दरस कौं जाहु पै परस न पास कौ। [3] पाछैं न सुन्यौं अब आगैं हूँ ह्वैं है ना ऐसौ कैसौ भैया जैसौ निजु महल श्रीस्वामी हरिदास कौ॥ [4] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (12) (कविता) मैं इबादत को ऐसा क्यों कहूं, मैं व्यापार को विलासिता क्यों कहूं, मैं उद्यम को श्रमिक गृह क्यों कहूं, मैं तो बस एक बन जाऊं। [1] जो सबसे बड़ा ज्ञान है, जो मन में ध्यान है, जो साधन है, जो शरीर के कष्टों से मुक्त है.. [2] जो भय से मुक्त है, जो मार्ग है, जो पारस तक पहुंचने वाला है और जो निकट है। [3].
Kou Vidya Vidhi Ved Bandhyau Bal