उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 3 of 131

(सवैया) कोऊ विद्या विधि वेद बँध्यौं बल, कोऊ धन धर्म कर्म कृत पास। [1] कोऊ जम नेंम कोऊ ब्रत संजम, कोऊ जप तप कोऊ भ्रमत उदास॥ [2] कोऊ कार्तिक अगहन मकर सीत, सहि कोऊ बैसाखीग्यास उपास। [3] संतत सुखद बिहारिनिदास कैं, श्रीहरिदास से श्रीहरिदास॥ [4] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (20) (सवैया) कुओ विद्या विधि वेद बंध्यों बल, कुओ धन धर्म कर्म कृत पास। [1] कुओ जम नेनम कुओ ब्रत संजम, कुओ जप तप कुओ भ्रमत उदास.. [2] कुओ कार्तिक अगहन मकर बैठो, सही कुओ बैसाखिग्यास उपास। [3] संतत सुखद बिहारिन दास कैन, श्री हरिदास ते श्री हरिदास.. [4] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत काव्य-सवैया (20)
Kou Vidya Vidhi Ved Bandhyau Balहाँ, श्री बिहारिन देव जू के शब्द, रस के छंद (20) मेरी स्वामिनी श्री रा