रसिकवर रसिकनी रस रासि

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 5 of 131

मेरी स्वामिनी प्रसन्न बदन साँवरौ सुखरासि। इनहिं लडाऊँ अनुदिन छिन छिन लहों स्याबासि॥ [1] फूली फूली टहल करों मन के मननि हुलासि। अनन्य श्रीहरिदास बिपुल बलि बलि बिहारिनिदासि॥ [2] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (20) मेरी स्वामिनी, प्रसन्न शरीर, सुगठित शरीर। आइए इन चीजों से लड़ें, इन्हें दूर ले जाएं, सियाबासी.. [1] अपना मज़ाक उड़ाएं, मैनी हुलसी। अनन्य श्री हरिदास बिपुल बाली बाली बिहारिनिदसी.. [2] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (20)
हाँ, श्री बिहारिन देव जू के शब्द, रस के छंद (20) मेरी स्वामिनी श्री राउद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ