केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं
Braj Binod — श्री लाल बलबीर
Verse 45 of 77
(कवित्त)
रसिक विहारी सुकमारी प्रान प्यारी जू कों,
सुखमा सजीली वनराज की दिखावें हैं। [1]
कैसे द्रुम बेली रंगरेली फल पल्लव सों,
झुक-झुक झूम-झूम भूम चूम जावें हैं॥ [2]
सहित सुवास फल फूलकें झरें अतूल,
चारों दिसि ही में मनो इन्द्र झर लावें हैं। [3]
डारन पै बैठे अनुरागन सों सारो सुक,
सुभग सजीली रसना सों तान गावें हैं॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (45)
(कविता) रसिक विहारी सुकामारी प्राण प्यारी जू को, सुखमा सजिली वनराज का दिखावा। [1] कैसे ढोल, बेली, रंगरेली, फाल, पल्लव, झुक-झुक, झूम-झूम, झूम-छम… [2] चारों ओर फल-फूलों की उत्तम सुगंध, झरने बह रहे हैं। [3] सिंहासन पर अनुरागन के पुत्र सरो सुक, सुसज्जित रसना के पुत्र तन गवन विराजमान हैं.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृन्दावन शतक (45)