केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं

Braj Binod — श्री लाल बलबीर

Verse 44 of 77

जमुना अन्हात वृषभान की कुमारि राधा, रूप की अगाधा तन छबि वृन्द बरसैं। [1] रमा उमा दमा सी सची सी सतभामा हूँ सी, मैनिका सी जाकी पद रेनुका कौं तरसैं॥ [2] 'लाल बलबीर' झुकि झुकि लता ओट लाल, बेर बेर हेर हेर हेर मन हरसैं। [3] चुबकि लगाय निसरत प्रान प्यारी मानौं, सामल घटा में चन्द छिप छिप दरसैं॥ [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (45) जमुना अनाहत वृषभान की कुमारी राधा, रूप की अपार देह छवि, वृंद बरसै। [1] राम उमा दामा के समान हैं, सतभामा सत्या के समान हैं, मनिका जकी के समान हैं, रेणुका किसे चाहती हैं? [2] 'लाल बलबीर' झुकें, झुकें लता लाल, बेर बेर हर हर, उसका नर सुख। [3] मेरे प्यारे दिल, चाँद भी बादलों में छिप जाता है.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (45)
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौंकेकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं