केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं

Braj Binod — श्री लाल बलबीर

Verse 48 of 77

(कवित्त) जानें को जतन सों बनौ यहै दाव तेरौ, याकौ सुख हेरौ पग बाहर न दीजियै। [1] चौधेहु भुवन ते इकन्त ये विहार भूमि, लाड़ली लला की रज अंग धार लीजियै॥ [2] 'लाल बलबीर' द्रुम बेली रंग रेलिन में, संतन के संग बैठ प्रेम रस पीजियै। [3] कृपा कौं विचारो राधे नाम कौ उचारौ, ऐसौ वृन्दावन-चन्द में सदॉ ही बास कीजियै॥ [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (50) (कविता) तुम्हें अपनी मां का बेटा बनने का प्रयास करना होगा, अगर तुम उसे अपनी खुशियों में कदम नहीं रखने देते। [1] चौधेहु भुवन यह एकांत आश्रय, राज धरो लाला लाला का.. [2] 'लाल बलबीर' ढोल बेली रंग रैली पुरुष, अपने बच्चों के साथ बैठो और प्यार का रस पीओ। [3] कृपा करो, जो सोचेगा राधे नाम, जो जपेगा नाम राधे, ऐसे रहो सदा वृन्दावन में - छंद.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (50)
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौंकेकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं