केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं
Braj Binod — श्री लाल बलबीर
Verse 56 of 77
एरे मन मेरे तो सों विनती करत ह्वौं रे,
काहे कौं भ्रमंत ब्रजभूमि पंथ गह रे। [1]
लता द्रुम बेलिन में राधा राधा धुन होय,
तहाँ जाय काम क्रोध लोभ मोह दह रे॥ [2]
'लाल बलबीर' जन जुगल उपासी सबै,
उनहीं की पद रज सीस धार लह रे। [3]
और की न आस कीजै वृन्दावन वास सदाँ,
राधे स्याम स्याम-स्याम राधे स्याम कह रे॥ [4]
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (67)
हे मन, मेरा बेटा मुझसे विनती कर रहा है, मैं गलत ब्रजभूमि संप्रदाय में क्यों जाऊं? [1] लता ढोल बेलिन में राधा राधा तूने होय, तहां जय कम, क्रोध सद मोह दाह रे.. [2] 'लाल बलबीर' जन जुगल उपासी, चरण पूजक सब मोहि। [3] और वृन्दावन वास सदन क्यों नहीं, राधे स्याम स्याम-स्याम राधे स्याम कह रे.. [4] - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (67)