केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं

Braj Binod — श्री लाल बलबीर

Verse 57 of 77

वृन्दावन चाहे दास दास ह्वै किसोरी जू कौ , ढूंकै जिन दूजी ओर चित ना डुलावैगो। [1] मनिक महल में विराजें प्रिया प्रीतम जू , तिनकौ सदैव हित ही सों गुन गावैगो॥ [2] 'लाल बलबीर' लैगौ रसिकन संग रंग, होयगौ अभंग तन ताप कौ नसावैगो। [3] प्रानन समान बनराज कौं गिनैगो तबै , जबै रस रीति प्रीति ही की रीति पावैगो॥ [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (73) यद्यपि वृन्दावन दास दास हैं, किसोरी जू कौ, धुनकै जिन दूजी या चित न डुलावैगो। [1]. [3] जब प्यार की बात आएगी तो रूह से कौन बात करेगा, जब प्यार उसी तरह मिलेगा। [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शताब्दी (73)
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौंकेकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं