केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं

Braj Binod — श्री लाल बलबीर

Verse 63 of 77

(कवित्त) जोग जग्य जप तप तीरथ गवन व्रत, कबहुँ न हरिदास श्रवण कथा करी। [1] भ्रमना भ्रमायौ माया मोह मद लिपटायौ, वृथां जग बादन में उमर बिता करी॥ [2] 'लाल बलबीर' मति हीन मैं मलीन पीन, सेवा रसिकन तनहूँ की नहिं जा करी। [3] कृष्ण अली जू की कृपा दृष्टि बर पाय पाय, राधा ठकुरायन के पायन की चाकरी॥ [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (105) (कविता) जोग जग्य जप तप तीरथ गवन व्रत, कहुँ हरिदास श्रवण कथा करि। [1] भटकते, माया और अभिमान में लिपटे, पुरानी दुनिया में जीवन जिया.. [2] 'लाल बलबीर' गंदे मन के न हों, सेवा में अकेले न हों। [3] कृष्ण अली जू की कृपा से मैं राधा ठकुराइन के चरणों की सेवा कर सका.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (105)
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौंकेकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं