केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं

Braj Binod — श्री लाल बलबीर

Verse 74 of 77

(कवित्त) मोहन की प्यारी वृषभान की दुलारी साधु, संत रखवारी भव भीरन बिनासनी। [1] संपत दिवैया कोट कंटक दरैया सदां, आनन्द करैया पूजौ जन मन आसनी॥ [2] 'लाल बलबीर' आयौ आस कर तेरी वीर, व्यापी भव पीर कौं मिटा दे सुखरासनी। [3] पातक अगाधा कीये दीन सुख साधा तुही, हरो मेरी बाधा राधा वृन्दावन बासनी॥ [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद (कविता) मोहन प्रिय वृषभान प्रिय साधु संत रखवारी भव भिरन बिनसानी। [1] संपत दिवैया कोट कंटक दरिया सदन, आनंद करैया पुजौ जन मन असनि। [2] 'लाल बलबीर' मैं तुम्हारा नायक बनकर आया हूँ, तुम व्यापारी बनो, सुख-दुःख दूर करने वाले बनो। [3] अपार खुशियों के दिन खुशियाँ सदा साथ हैं, हरो मेरी बढ़ा राधा वृन्दावन बासनी.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोदा
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौंकेकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं