कीच लगी ब्रज खिरक की
Braj Ke Dohe — ब्रज के दोहे
Verse 176 of 229
रसिक तबहिं पहिचानिये, जाके यह रस-रीति।
छिन-छिन हिय में झलकि रहे, लाल लाड़िली प्रीति॥
- ब्रज के दोहे
रसिक तबहिं पछिचानिये, जेके यः रस-रीति। मन की छीना-झपटी ही दिखाई देती है, लाल लड़ता प्रेम... -ब्रज के दोहे