कीच लगी ब्रज खिरक की
Braj Ke Dohe — ब्रज के दोहे
Verse 207 of 229
तन विच प्राण अटक रहे, लागी दर्शन आस।
क्यों पटकी मँझधार में, राख आपने पास॥
- ब्रज के दोहे
मेरा तन और मन अटक गया है, इसे देखने का मन हो रहा है। तुम्हें क्या मालूम कि बीच दरिया में राख है.. -ब्रज के दोहे, अब तो इस शरीर में प्राण तुम्हारे दर्शन की ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। हे दयालु स्वामिनी! तुमने मुझे इस संसार के अथाह सागर में क्यों फेंक दिया? अब मुझ पर कृपा करो और मुझे सदैव के लिए अपने चरणों के पास ले लो, मुझे श्री धाम वृन्दावन में ही निवास कराओ।