कीच लगी ब्रज खिरक की

Braj Ke Dohe — ब्रज के दोहे

Verse 48 of 229

ढूँढ़ि फिरै त्रेलोक जौ, मिलत कहूँ हरि नाहिं। प्रेम रूप दोऊँ एकरस, बसत निकुँजन माहि॥ - ब्रज के दोहे मैंने उसे तीनों लोकों में खोजा, परंतु वह मुझे नहीं मिला। प्रेम नीरस कर दूं, बसत निकुंजन माहि.. -ब्रज के दोहे
कीच लगी ब्रज खिरक कीकीच लगी ब्रज खिरक की