जानें रसिक अनन्य जे अनुरागे रस प्रेम
Braj Ke Dohe — ब्रज के दोहे
Verse 80 of 229
जानें रसिक अनन्य जे, अनुरागे रस प्रेम।
फिरत सदा उन्मत्त से, तजि निषेध विधि नेम॥
- ब्रज के दोहे
जनीन रसिक आंज, अनुराग रसिक प्रेम। पागलपन से हमेशा दूर रहें, वर्जित तरीकों से बचें। -ब्रज के दोहे