अब तो कहिबे की न रही
Chhutak Pada —
Verse 14 of 35
मोहन कृपा कटाक्ष निहारैंगे। [1]
मेरे औगुन सबै बिसरि कैं अपने विरद विचारैंगे॥ [2]
वृन्दाविपुन बास दृढ़ दैकैं अब दुख दूर निवारैंगे। [3]
नागरिदास नांव कैं नातैं बिगरी बात सुधारैंगे॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (140)
व्यंग्य पर मोहन की कृपा दृष्टि रहेगी। [1] मैं अपने सभी अतीत और अपने शत्रुओं के विचारों को क्यों भूल जाऊं.. [2] वृंदाविपुन के न्यायप्रिय द्रिधा डीकन अब सभी दुखों को दूर करेंगे। [3] नागरीदास नानाव कैं नाटैं बद्री.. सुधार.. [4] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छुटक पद (140)