अब तो कहिबे की न रही
Chhutak Pada —
Verse 13 of 35
करिये ब्रज बासिन सौं नेह।
नख सिख भरे प्रीत रस सागर आवत कबहुँ न छेह॥ [1]
नन्दनन्दन प्यारे के प्यारे नित मतवारे रूप।
नागरीदास मिलावत मोहन रसिक कुंवर व्रज भूप॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (3)
कृपया इसे ब्रज बेसिन में करें। उपदेशों से भरा हुआ प्रेम का सागर कब नहीं आएगा? [1] प्रियतम का सुन्दर एवं मादक रूप। नागरीदास मिलावत मोहन रसिक कुँवर वृज भूप.. [2] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिन्हा), श्री नागरीदास जी की वाणी, छुटक पद (3)