अब तो कहिबे की न रही

Chhutak Pada —

Verse 16 of 35

व्रज को स्वाद वैकुण्ठ में नाहीं। हरि गुन कंथा भई जब मीठी व्रजरस मिल्यो तबे ता माहीं॥ [1] व्रजरस बिन कहा रसिक गावते व्रज बिनु रस मरि जातो। ब्रज महिमा को वेई जानें जिन के व्रज सों नातो॥ [2] भुवन चतुर्दश मांझ धन्य ब्रज धनि-धनि ये ब्रजवासी। नागरीदास धन्य हैं सोई जो व्रज रैनु उपासी॥ [3] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद ( 146) वैकुण्ठ में व्रज का कोई स्वाद नहीं है। हरि गुण कंथा भाई जब मीठी व्रजरस मिल्यो तबे ता माही.. [1] व्रजरस बिन कहा रसिक गावते व्रज बिनु रस मारी जातो। धन्य हैं वे लोग जिनके व्रज पुत्र पैदा हुए हैं, ब्रज की महिमा है.. [2] धन्य हैं वे ब्रज के लोग जो भुवन चतुर्दश के मध्य धनवान और धनवान हैं। धन्य हैं नागरीदास जो व्रज में सोये, रैनु उपासी.. [3] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिन्हा), श्री नागरीदास जी की वाणी, छुटक पद (146)
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