अब तो कहिबे की न रही
Chhutak Pada —
Verse 17 of 35
(राग-केदारौ, ताल-त्रिताल)
ये ब्रजबासी हरि के प्यारे।
वे हरि में, हरि इनमें नित प्रति, पल छिन होत न न्यारे॥ [1]
इंद्र आदि सुर, असुर, दवानल, विषजल तैं जु उबारे।
नागरिदास किते या ब्रज पर, पचि-पचि गये बिचारे॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (125)
(राग-केदारौ, ताल-त्रितला) यह ब्रजबासी हरि का प्रिय है। वे हरे आदमी, हरे पुरस्कार हर दिन हैं, हर पल छीने जाते हैं। नागरीदास ने पतंग उड़ायी या ब्रज पार कर गये, पीछे पीछे बिचारा.. [2] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिन्हा), श्री नागरीदास जी की वाणी, छुटक पद (125)