अब तो कहिबे की न रही
Chhutak Pada —
Verse 2 of 35
अब तो कहिबे की न रही।
अपनी बाँह छाँहतर राख्यो, वृन्दाविपुन मही॥ [1]
ऐसें ही करि कृपा मेटियै, काम क्रोध सबही।
‘नागरिया’ की छूटि जाय, तुम्हैं सब ही कहा-कही॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (123)
अब यह ख़त्म हो गया है. भुजाओं को स्वच्छ रखो वृन्दाविपुन माहि। [1] दयालु होकर ही दयालु बनें, काम क्रोध सब हैं। 'नगरिया' को छोड़ देना चाहिए, आप सब कहते रहते हैं.. [2] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिन्हा), श्री नागरीदास जी की वाणी, चुटक पद (123)