किशोरी मोरी अब न लगाओ बार

Dainy Madhuri — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

Verse 3 of 3

राधे मोहिं, चरण कमल रज कीजै। तुव मानिनि हित पिय दृग - जल सों, जा पदरज नित भीजै॥ [1] जा पावन पदरज पावन को, कमलाहू कर मीजै। जेहि लगि विधि वरदान माँगि कह, नाथ ! सोइ रज दीजै॥ [2] बिनु कारण करुणाकारिणि तुम, मम पुकार सुनि लीजै। अंध ‘कृपालु’ पाय दृग जब ही, तब ही सही पतीजै॥ [3] - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (79) श्री राधे मोहिं मेरे चरण कमलों पर कृपा करें। तुम मेरी पत्नी के कल्याण के प्रिय हो, पानी पियो - जल के पुत्र, पवन के राजा के पास नित जाओ.. [1] पवन के राजा के पास जाओ, उसे कामी बनाओ। जब भी वह रीति-रिवाज के अनुसार वर मांगता, तो कहता, हे प्रभु! सोई राज दीजै.. [2] तुम बिन कारण ही दयालु हो, सुनो मेरी माँ की पुकार। अंधा 'कृपालु' तभी चुकाए जब दवा पक्की, तभी सही पति.. [3] - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैनिक माधुरी (79)
किशोरी मोरी अब न लगाओ बार