देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी

Gadadhar Bhatt Vani — श्री गदाधर भट्ट

Verse 1 of 10

अंग अंग प्रेम बरखत, सकल सुखकी मूरि। राधे जू के चरण की रज, गदाधर सिर धूरि॥ - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (38.9) प्रेम का कण-कण खिलता है, मरता है सारा संसार। राधे जू, गदाधर सर धुरी के चरणों का रहस्य.. - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (38.9)
देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी