राधे दै बृंदावन-बास

Ghanananda Granthavali — श्री घनानंद

Verse 41 of 48

(राग सारंग- चौताला) राधे दै बृंदावन-बास। तेरो ह्वै मन पनिहि परि रहै, तनहूँ ताही पास॥ [1] महामधुर रसकेलि-माधुरी, फुरै हियै अनयास। हरी खरी सुखभरी निकुंजै, नौ नौ रंग-बिकास॥ [2] जमुना-तीर ललित बंसी-धुनि, अदभुत अमी-निवास। कृपा-रमँड घमँडनि आनँदघन, बेगि पुरियैं आस॥ [3] - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (372) (राग सारंगा-चौटाला) राधे दै बृंदावन-बास। तेरो हावै मन पनिहि परि रहै, तनहु ताहि पास.. [1] महामधुर रस्केली-माधुरी, फुरै हियै अनायस। हरि खरी सुखभरि निकुंजाई, नौ नौ रंग-विकास। [2] जमुना-तीर, उत्तम बाँसुरी-धूनी, अद्भुत अमी-निवास। कृपा-रामानंद घमंडानी आनंदघन, बेगी पुरिया अस.. [3] - श्री आनंदघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (372)
नित बिहार बृंदावन राधा मोहनRadhe Dai Vrindavan-Vaas