नित बिहार बृंदावन राधा मोहन

Ghanananda Granthavali — श्री घनानंद

Verse 40 of 48

(राग अलहिया बिलावल - इकताला) नित बिहार बृंदावन राधा-मोहन करत रहैं। सहज रंगीले छैल छबीले हित-चित-लाह लहैं॥ [1] नित ब्रज नित व्यवहार नित नए तन मन पननि बहैं। नित ही हित झूमैं आनँदघन जमुना-तीर गहैं॥ [2] - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (637) (राग अलहिया बिलावल - इक्ताल) बिहार बृंदावन राधा-मोहन, नित करते रहो। नैसर्गिक, रंग-बिरंगी, सुन्दर अभिरुचियाँ हैं.. [1] नित-नित ब्रज, नित-नित व्यवहार, नित नवीन तन-मन बह रहा है। आनंदघन नित जमुना-तीर जाते हैं.. [2] - श्री आनंदघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (637)
नित बिहार बृंदावन राधा मोहनराधे दै बृंदावन-बास