इस्कलता ब्रजचंद की जो बाँचै दै चित्त

Ghanananda Granthavali — श्री घनानंद

Verse 44 of 48

इस्कलता ब्रजचंद की, जो बाँचै दै चित्त। वृंदावन सुखधाम सो, लहै नित्त ही नित्त॥ - श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, इश्क़लता (44) ये कहानी है ब्रजचंद की, जो मेरे मन में बसी हुई है. वृन्दावन सुख का धाम है, नित्य नित्य है.. - श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, इश्कलता (44)
इस्कलता ब्रजचंद की जो बाँचै दै चित्ततेरे नैंन मेरे नैंन मेरे नैंन तेरे नैंन