तेरे नैंन मेरे नैंन मेरे नैंन तेरे नैंन
Ghanananda Granthavali — श्री घनानंद
Verse 48 of 48
(कवित्त)
तेरे नैंन मेरे नैंन मेरे नैंन तेरे नैंन,
और ठौर चलिबे क़ौं दीठ कैं न पग हैं। [1]
तेरी प्रीति मेरी प्रीति मेरी प्रीति तेरी प्रीति,
प्रीति की प्रतीति दोऊ और बैठी लग हैं॥ [2]
तेरे प्रान मेरे प्रान मेरे प्रान तेरे प्रान
‘नागरिया’ एक प्रान जानैं सब जग है। [3]
तेरौ मन मेरौ मन मेरौ मन तेरौ मन
मेरो मन ठगिबे कौ तेरो मन ठग है॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (23)
(कविता) तेरी आँखें, मेरी आँखें, मेरी आँखें, तेरी आँखें, और कौन कहीं चलने की हिम्मत करता है? [1] तेरा प्यार, मेरा प्यार, मेरा प्यार, तेरा प्यार, प्यार का जोड़ा एक साथ बैठा हुआ लगता है.. [2] तेरी जान, मेरी जान, मेरी जान, तेरी जान 'नगरिया', एक प्यार, सारी दुनिया जानती है। [3] तेरा मन मेरा, मेरा मन तेरा मन, मेरा मन थक गया, तेरा मन ठग.. [4] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिन्हा), श्री नागरीदास जी के वचन, लघु कविता (23)