आज खेलें होरी नव नागरी
Govindsharan Devachary Vani — श्री गोविन्दशरण देवाचार्य
Verse 1 of 5
(राग परज)
आज खेलें होरी नव नागरी।
सरस गुलाल डार प्रीतम पै, सकल कला गुन आगरी॥ [1]
श्रीवृषभान भवन में सजनी, फैलि रह्यौ अनुराग री।
कीरति कुल कीरति गावति लखि, गोबिंदसरन बड़भाग री॥ [2]
- श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (151)
(राग परजा) आज खेल होरी नव नागरी। सरस गुलाल डार प्रीतम पै, सकल कला गुन अगारि..[1] प्रिय अनुराग, श्री वृषभान भवन में प्रेम फैलाओ। कीर्ति कुल कीर्ति गावति लखि, गोबिंदशरण बड़भाग री.. [2] - श्री गोविंदशरण देवाचार्य, श्री गोविंदशरण देवाचार्य की वाणी (151)