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Govindsharan Devachary Vani — श्री गोविन्दशरण देवाचार्य
Verse 4 of 5
कुल रूप उज़ारी मेरी स्वामिनी।
कंचन तन नीलांबर सोभित गुन निधि राधा नामिनी॥ [1]
कुंजमहल राजत मोहन सँग जैसे घन सँग दामिनी।
गोविंदसरन कौं सरन राख अब हरि प्रीतम अभिरामिनी॥ [2]
- श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (25)
मेरी मालकिन ने अपना पूरा रूप बताया। कंचन तं नीलानबर शोभित गुण निधि राधा नामिनी। [1] कुंजमहल रजत मोहन के पास है जैसे घन दामिनी के पास है। अब अस्थियां समर्पित हैं गोविंद शरणं, हरि प्रीतम अभिरामिणी। [2] - श्री गोविंदशरण देवाचार्य जी, श्री गोविंदशरण देवाचार्य जी का भाषण (25)