हमारैं साहिबनी वन रानी
Govindsharan Devachary Vani — श्री गोविन्दशरण देवाचार्य
Verse 3 of 5
(राग विहागरौ)
हमारैं साहिबनी वन रानी।
बेद पुरान जासु जस गावै नन्द-नंदन सुखदानी॥ [1]
रूप अगाध हरन भव बाधा राधा भूषन बानी।
एक भरोसो बल उनही कौ बात नहीं यह छानी॥ [2]
जाके प्रेम पग्यौ मन मोहन वृन्दावन रजधानी।
करत विहार रसिक चूड़ामनि पल पल तृपति न मानी॥ [3]
जोगी जपी तपी सन्यासी रस विहीन जे ज्ञानी।
यह सुख तिनकों सुपने हू नहि ‘गोबिंदसरन’ बखानी॥ [4]
- श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (96)
(राग विहगरौ) हमरैण साहिबानी वन रानी। वेद पुरान जसु जसु जस गवै नन्द-नन्दन सुखदानी।।[1] रूप अगध हरण भव बाधा राधा भूषण बानी। इन पर भरोसा करने की जरूरत नहीं है, ये मोहतरमा.. [2] जेके प्रेम पग्यौ मन मोहन वृन्दावन राजधानी। करत विहार रसिक चूड़ामणि पल पल त्रिपाठी न मणि।।[3] जोगी जपि तपि संन्यासी रस वहीं जे ज्ञानी। 'गोबिंदशरण' मैं इस ख़ुशी की कल्पना भी नहीं कर सकता.. [4] - श्री गोबिंदशरण देवचारी जी, श्री गोबिंदशरण देवचारी जी का भाषण (96)