जै जै माधो मन मोहिनी श्रीराधिके

Hari Lila — श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी)

Verse 1 of 6

(दोहा) छवि अपार श्रृंगार की, आरति जय जय कार। करत प्रेम परिवार मिल, बार बार बलिहार॥ (पद) श्री राधिका माधव छवी अपार। करत प्रेम परिवार मिलीं, अलि आरति रति श्रृंगार॥ [1] वीनावेनु वाद्यवर विलसित, गावत जय जय कार। श्री प्रियासखी तृनतोर जोर कर, बार बार बलिहार॥ [2] - श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), हरि लीला (18) (दोहा) श्रीराधा-कृष्ण के सुन्दर श्रृंगार की छवि अद्भुत है, सखियाँ आरती करती हुई उनकी जय-जयकार कर रही हैं। सब सखी-परिवार मिलकर बार-बार स्वयं को न्योछावर कर रहा है। (पद) श्री राधिका-माधव की शोभा बड़ी ही अद्भुत एवं अलौकिक है। सखियाँ प्रेमपूर्वक उनका श्रृंगार कर आरती कर रही हैं। [1] कुछ वीणा, कुछ वेणु, और कुछ अन्य वाद्य बजा रही हैं; प्रेम में उन्मत्त होकर जय जय कार कर रही हैं। श्री प्रियासखी प्रेम में विभोर होकर, तृण तोड़कर स्वयं को युगल किशोर की सुन्दर जोड़ी पर न्योंछावर कर रही हैं। [2]
परम प्राण धन कुंज में करत विहार विशाल