तैं भाजन कृत जटित विमल

Hit Sfut Vani — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 26 of 26

(छप्पय) तैं भाजन कृत जटित विमल चंदन कृत इन्धन। अमृत पूरि तिहे मध्य करत सरषप - खल रिंधन॥ [1] अद्भुत धर पर करत कष्ट कंचन हल वाहत। बार करत पाँवार मंद बोबन विष चाहत॥ [2] (जैश्री) हित हरिवंश विचारि कै मनुज देह गुरु-चरण गहि। सकहि तौ सब परपंच तजि कृष्ण-कृष्ण-गोविन्द कहि॥ [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री स्फुट वाणी (7) (छप्पय) तै भजन कृत जाति विमल चंदन कृत ईंधन। शीश अमृत को शाप - खल रिन्धन। [1] कंचन हॉल उस अद्भुत भूमि पर पीड़ा रचता है। पनवार की वेदना, इच्छा का मन्द प्रवाह विषैला है.. [2] (जयश्री) हरिवंश हृदय विचारशील है, गुरु के चरणों में नर का शरीर है। सखी तौ सब परपंच तजि कृष्ण-कृष्ण-गोविंद कहिए.. [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री स्फुट वाणी (7)
तैं भाजन कृत जटित विमल