कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ
Kant Rasik Vani — श्री कान्त किशोर
Verse 1 of 7
बंदौं श्रीहरिदास के, चरन-कमल चित लाइ।
जिन निज उर की माधुरी, दई प्रतच्छ दिखाइ॥
- श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (19)
श्री हरिदास के भक्तों ने उनके चरणकमलों को अपने हृदय में धारण कर लिया। किसी के हृदय की मधुरता झलकती है.. - श्री कांत किशोर, कांत रसिक जी की वाणी, दोहा (19)