कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ

Kant Rasik Vani — श्री कान्त किशोर

Verse 2 of 7

कान्त द्वैत अद्वैत नहि, नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ। वेद-विवादनि सों परे, सो रसिकन कौ इष्ट॥ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (5) कांट का द्वैतवाद अद्वैतवादी नहीं है, अशिष्ट नहीं है। यदि पुत्र वेदज्ञान से परे है तो प्रेमी का प्रिय कौन है? - श्री कांत किशोर, कांत रसिक जी की वाणी, दोहा (5)
कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठकान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ