कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ

Kant Rasik Vani — श्री कान्त किशोर

Verse 7 of 7

स्वारथ कौ संसार सब, परमारथ कौ खोल। बात करें रस-रीति की, भीतर भंडर डोल॥ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (7) कौन स्वार्थ के लिए संसार खोलता है और कौन परोपकार के लिए? स्वाद और रीति की बात, भीतर भंडार.. - श्री कांत किशोर, कांत रसिक जी की वाणी, दोहा (7)
कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ