कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ
Kant Rasik Vani — श्री कान्त किशोर
Verse 6 of 7
श्री स्वामी हरिदास के, चरन कमल चित लाउ।
कान्त रसिक रस-माधुरी, लखै न और उपाउ॥
- श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (1)
श्री स्वामी हरिदास के चरण कमल। कांत रसिक रस-माधुरी, लखैन और उपौ.. - श्री कांत किशोर, कंत रसिक जी की आवाज, दोहा (1)