द्वै लर मोतिन की एक पुंजा पोति कौ सादा

Kelimal — स्वामी श्री हरिदास

Verse 10 of 69

(राग कान्हरौ) राधे चलि री हरि बोलत कोकिला अलापत सुर देत पंछी राग बन्यो। [1] जहाँ मोर काछ बाँधे नृत्य करत मेघ मृदंग बजावत बंधान गन्यौ॥ [2] प्रकृति की कोऊ नाहीं यातें सुरति के उनमान गहि हौं आई मैं जन्यौ। [3] श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी की अटपटी बानि औरै कहत कछु औरे भन्यौ॥ [4] - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (14) (राग कान्हारौ) राधे चाली री हरि बोलोट कोकिला अलापत सूर देत पंछी राग बाण्यो। [1] जहां कच्छ में बंधा मोर नाचता है, मेघ नाचते हैं, मृदंग बजावत बंधन गन्याउ.. [2] मैं कुदरत का कुआं नहीं, सुरति के हृदय में बसता हूं, अरे मैं तुम्हें जानता हूं। [3] स्वामी श्यामा कुंजबिहारी की अटापति बानी श्री हरिदास की, औराई कहत कछू औरे भयौ.. [4] - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमल (14)
द्वै लर मोतिन की एक पुंजा पोति कौ सादाद्वै लर मोतिन की एक पुंजा पोति कौ सादा