बिलसत प्यारी-लाल कुंज रजनी
Kelimal — स्वामी श्री हरिदास
Verse 34 of 69
(राग केदारौ व सारंग)
सुनि धुनि मुरली बन बाजै हरि रास रच्यौ।
कुंज कुंज द्रुम बेलि प्रफुल्लित
मंडल कंचन मनिन खच्यौ॥ [1]
नृत्तत जुगलकिसोर जुवति जन
मन मिलि राग केदारौ मच्यौ।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
नीकै री आजु प्यारौ लाल नच्यौ॥ [2]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (52)
(राग केदारौ वे सारंगा) सुनो, बांसुरी की धुन बजाओ और हरि रस रचो। कुंज कुंज ढोल बेली प्रफुल्ल मंडल कंचन मनिन खाचयौ..[1] नृत्तत् जुगलकिसोर जुवति जन मन मिलि राग केदारौ मचायौ। श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी निकाई री आजु प्यारु लाल नाच्यो.. [2] - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमल (52)