ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि
Kelimal — स्वामी श्री हरिदास
Verse 43 of 69
(राग सारंग)
चलिये छबीली छबीलौ बोलत।
आजु की बानिक पर तृन टूटत है
कही न जाय कछु स्याम तोहिं रत॥ [1]
सखी लै चली मनाय जयौं हित की आई घत।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा बीच ही आई मिलै
तन की सुबास सकल भँवर कलमत॥ [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (69)
(राग सारंगा) छबीली छबीलौ कहो। आज किनारे पर हवा चल रही है, शाम को कहीं जाने का मन नहीं हो रहा, रात हो चुकी है। श्री हरिदास के प्रभु श्याम ने, सारे तूफ़ान में अपने तन की ख़ुशबू ढूंढ ली। [2] - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमल (69)