कुंजबिहारी कौ बसन्त सखि
Kelimal — स्वामी श्री हरिदास
Verse 55 of 69
(राग गौड़)
कुंजबिहारी कौ बसन्त सखि,
चलहू न देखन जाँहिं।
नव बन नव निकुंज नव पल्लव,
नव जुवतिन मिलि माँहिं ॥ [1]
बंसी सरस मधुर धुनि सुनियत,
फूली अंग न माँहिं।
सुनि श्रीहरिदास प्रेम सौं प्रेमहिं,
छिरकत छैल छुबाँहिं॥ [2]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (99)
(राग गौड़ा) कुंजबिहारी कौ बसंत सखी, चलहु न देखन। नव बन नव निकुंज नव पल्लव, नव जुवतिन मिलि मनहिं।।[1] बंसी सरस मधुर धुन सुनियत, फूलि अंग न मनहिं। सुनो श्री हरिदास प्रेम सौ प्रेमहिं, चिरकत छैल चबानाहिं.. [2] - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमल (99)