वृषभानु कुँवरि खेलति बसंत

Kelimal — स्वामी श्री हरिदास

Verse 56 of 69

(राग बसंत) चलि री भीर तें न्यारेई खेलैं । कुंज निकुंज मंजु में झेलैं ॥ [1] जहाँ पंछी न सहित सखी न संग कोऊ तिहिं बन चलि मिलि केलैं। [2] श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा प्रेम परस्पर बूका बंदन मेलैं॥ [3] - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (100) (राग बसंता) चाली री भीर तेन न्यारी खेलैं। कुंज में, उपवन में शांति है.. [1] जहाँ न पक्षी हैं, न साथी, वहाँ मित्रों की संगति में बहुत सुख है। [2] श्री हरिदास के स्वामी श्यामा प्रेम प्रत्यक्ष बुका बंधन मेलेन.. [3] - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमल (100)
कुंजबिहारी कौ बसन्त सखिझुलत डोल दोऊ जन ठाढ़े