तेरे नैंननि की बलि जाउँँ
Krishnadas Vani — श्री कृष्णदास अधिकारी
Verse 11 of 28
(राग मालव गौड़)
ज्यों ज्यों राखो त्यों त्यों रहूँ जु देहु सु खाउँ।
तुमही मेरे पति गति लेउँ तेरो नाउँ॥ [1]
मेरे जान तजहु, गिरिधरन जो तुमहि छाड़िं प्रिय कौन पै जाऊँ।
कृष्णदास कहे या त्रिभुवन में तेरे द्वारे बिना हरि नाहीं कहूँ ठाऊँ॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1079)
(राग मालव गौड़ा) जैसा तुम रखोगे वैसा ही रहूंगा, कहां जाऊं? मैं तुम्हें गिरा हुआ पाता हूं, तुम्हारा नाम। [1] मेरे प्रिय गिरिधरन, तुम पर कौन गिरो प्रिय, मैं किसे ढूंढूं? चाहे कृष्णदास कहें या त्रिभुवन में तुम बिन मैं हरि नहीं कह सकता.. [2] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1079)