परसाद विहारिनि रानी कौ

Lalit Kishori Vani — श्री ललित किशोरी देव

Verse 24 of 35

(राग गौरी) श्री हरिदास शरण जे आये। कुंजबिहारी ललित लाडिले अपने जानि निकट बैठाये॥ (1) कुंज केलि निरखें निसि बासर अति आनंद हिये में छाये। दास बिहारिनि सब सुखरासी प्रानप्रिय हँसि कंठ लगाये॥ (2) - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (52) (राग गौरी) श्री हरिदास जय शरण जय। प्रियतम के पास बैठे कुंजबिहारी ललित लाडिले.. (1) कुंज के लिए राखें निसि बसर है मन के लिए। दास बिहारिणी सब सुखरासी, प्राणप्रिय हंसी कंत लागे.. (2) - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत पद (52)
परसाद विहारिनि रानी कौपरसाद विहारिनि रानी कौ